₹10 की दवा ₹100 में क्यों? बीमारी का धंधा और आम इंसान की लाचारी
एन. सिंह · ·6 मिनट
किसी भी मध्यमवर्गीय या गरीब भारतीय परिवार के घर में जब कोई गंभीर बीमारी (जैसे कैंसर, किडनी फेलियर, हृदय रोग या लकवा) दस्तक देती है, तो उस घर में केवल एक मरीज नहीं कराहता; उस पूरे परिवार की आर्थिक रीढ़ टूट जाती है।
अस्पताल का बिल चुकाने के लिए माँ के कान के झाले बिक जाते हैं, खेत की दो बीघा ज़मीन गिरवी रख दी जाती है, और परिवार सूदखोर महाजनों के चंगुल में फंसकर जिंदगी भर के लिए बंधुआ मजदूर बन जाता है। नीति आयोग के अपने आंकड़े बताते हैं कि भारत में हर साल लगभग 6 करोड़ लोग केवल इलाज और दवाओं के भारी खर्च के कारण गरीबी रेखा से नीचे (Below Poverty Line) धकेल दिए जाते हैं!
अब दवा की दुकान के काउंटर का वह कड़वा सच देखिए जो आपकी आंखें खोल देगा।
आप डॉक्टर का पर्चा लेकर मेडिकल स्टोर पर जाते हैं। केमिस्ट आपको एक पत्ता देता है जिस पर एमआरपी लिखा होता है—₹980। आप लाचारी में पैसे चुकाते हैं।
परंतु यदि आप उस दवा की वास्तविक निर्माण लागत (Manufacturing Cost) का पता लगाएं, तो वह दवा मात्र ₹15 से ₹20 में बनकर तैयार हुई होती है!
जो दवा ₹15 में बन सकती है, उस पर ₹980 का एमआरपी छापने की कानूनी इजाजत किसने दी? यह 1000% से लेकर 4000% का मुनाफा किसकी जेब में जा रहा है? क्या यह दवा का व्यापार है, या बीमारी और लाचारी की आड़ में आम इंसान की संगठित डकैती?
फार्मा-माफिया, कॉर्पोरेट अस्पताल और डॉक्टरों का त्रिकोण
लेखक एन. सिंह अपनी पुस्तक ‘अनोखा भारत’ में इस सिंडिकेट की परत-दर-परत पोल खोलते हैं:
- ब्रांडेड बनाम जेनरिक का महा-धोखा: जेनरिक दवा (Generic Drug) में वही सॉल्ट, वही फॉर्मूला और वही असर होता है जो किसी महंगी ब्रांडेड दवा में होता है। सरकार के ‘जन औषधि केंद्र’ पर वही पैरासिटामोल या बीपी की दवा 10 रुपये में मिलती है, जिसे प्राइवेट कंपनी ब्रांडेड पैकिंग में 120 रुपये में बेचती है! परंतु प्राइवेट डॉक्टर कभी जेनरिक नाम नहीं लिखते; वे वही दवा लिखेंगे जिस पर उन्हें कंपनी से भारी कमीशन मिलता है।
- डॉक्टरों को विदेशी टूर और महंगे तोहफे: बड़ी-बड़ी फार्मा कंपनियां डॉक्टरों को अपनी दवाइयां लिखने के बदले में स्विट्जरलैंड और दुबई के फैमिली हॉलिडे पैकेज, लग्जरी कारें, और फाइव स्टार होटलों में मेडिकल कॉन्फ्रेंस के नाम पर पार्टियां स्पॉन्सर करती हैं। इस ऐशो-आराम का सारा बिल मरीज की दवा के पर्चे में जोड़ दिया जाता है।
- सरकारी अस्पतालों की जानबूझकर बर्बादी: प्राइवेट अस्पतालों और फार्मा लॉबी के इशारे पर सरकारी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों (PHC) और जिला अस्पतालों को जानबूझकर बदहाल रखा जाता है। वहाँ डॉक्टर नहीं मिलेंगे, एमआरआई और सीटी स्कैन मशीनें हमेशा ‘खराब’ मिलेंगी, ताकि मजबूर होकर मरीज को सामने वाले प्राइवेट नर्सिंग होम में जाना पड़े जहाँ कदम रखते ही मीटर चालू हो जाता है!
दवा की वास्तविक लागत बनाम बाज़ार की खुली लूट
| दवा का प्रकार / सॉल्ट | वास्तविक निर्माण लागत (API + पैकेजिंग) | जन औषधि केंद्र का मूल्य | प्राइवेट ब्रांडेड एमआरपी (खुली लूट) |
|---|---|---|---|
| कैंसर की दवा (Imatinib) | ₹800 प्रति माह | ₹1,500 प्रति माह | ₹60,000 से ₹1,20,000 प्रति माह |
| मधुमेह की दवा (Metformin) | ₹2 प्रति पत्ता (10 गोली) | ₹6 प्रति पत्ता | ₹65 से ₹110 प्रति पत्ता |
| ब्लड प्रेशर (Amlodipine) | ₹1.50 प्रति पत्ता | ₹5 प्रति पत्ता | ₹45 से ₹80 प्रति पत्ता |
| एंटीबायोटिक (Azithromycin) | ₹12 प्रति पैक (3 गोली) | ₹25 प्रति पैक | ₹120 से ₹180 प्रति पैक |
किताब से कड़वा सच: एन. सिंह का निर्मम प्रहार
लेखक एन. सिंह अपनी पुस्तक ‘अनोखा भारत’ के अध्याय ‘चिकित्सा का बाज़ार और कफन की लूट’ में लिखते हैं:
“जब चिकित्सा सेवा न रहकर सबसे क्रूर और बेदर्द व्यापार बन जाए, तो समझ लीजिए कि समाज की अंतरात्मा मर चुकी है। बीमारी भगवान की तरफ से नहीं आती, लेकिन बीमारी का बिल सीधे कॉरपोरेट अस्पतालों के कसाईखाने से आता है। प्राचीन भारत में चरक और सुश्रुत ने चिकित्सा को पुण्य और धर्म का कार्य माना था; आज के कॉर्पोरेट अस्पतालों में प्रवेश करते ही ऐसा लगता है मानो आप किसी अस्पताल में नहीं, बल्कि कसाईखाने में आ गए हों जहाँ आपके शरीर के एक-एक अंग की कीमत लगाई जा रही है। अगर राज्य अपने नागरिकों को सस्ती दवा और मुफ्त इलाज नहीं दे सकता, तो उस राज्य को ‘कल्याणकारी’ कहने का कोई अधिकार नहीं है!”
— एन. सिंह (अनोखा भारत, पृष्ठ 182-183)
लेखक आगे समाधान की मांग करते हैं:
“सरकार शराब की दुकानों पर तो लाइसेंस और टैक्स का डंडा चलाती है, लेकिन जीवन रक्षक दवाओं पर 2000% मुनाफा कमाने वाले फार्मा-माफिया के आगे भीगी बिल्ली बन जाती है! जब तक दवा के अधिकतम खुदरा मूल्य (MRP) पर लागत के 20% से अधिक मुनाफे पर पूर्ण कानूनी रोक नहीं लगेगी, तब तक भारत का गरीब कभी स्वस्थ नहीं हो सकता।”
— (अनोखा भारत, पृष्ठ 186)
दवा और इलाज की लूट रोकने के चार युगांतकारी कदम
- केवल ‘जेनरिक’ नाम लिखने की कानूनी अनिवार्यता: डॉक्टरों के लिए किसी भी ब्रांडेड कंपनी का नाम लिखने पर सख्त कानूनी रोक हो; डॉक्टर केवल केमिकल सॉल्ट का नाम लिखें ताकि मरीज किसी भी दुकान से सबसे सस्ती दवा खरीदने के लिए स्वतंत्र हो।
- एमआरपी पर 30% मुनाफे की कानूनी सीमा (Price Capping): दवा की फैक्ट्री लागत पर अधिकतम 30% (वितरण व केमिस्ट का कमीशन मिलाकर) से अधिक एमआरपी छापना गैर-जमानती अपराध घोषित किया जाए।
- हर ब्लॉक में पूर्ण सुसज्जित जन औषधि केंद्र: जन औषधि केंद्रों में दवाओं की कमी न हो; सभी 2000 आवश्यक जीवन रक्षक दवाएं 24 घंटे उपलब्ध कराई जाएं।
- राइट टू हेल्थ (Right to Health) को मौलिक अधिकार बनाना: राजस्थान की तर्ज पर पूरे देश में आपातकालीन इलाज और जीवन रक्षक दवाओं को संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत हर नागरिक का मौलिक कानूनी अधिकार बनाया जाए।
एक विचारणीय सवाल (पुस्तक का संदेश)
क्या किसी इंसान की ज़िंदगी की कीमत इस बात से तय होगी कि उसकी जेब में दवा खरीदने के पैसे हैं या नहीं?
स्वास्थ्य व्यवस्था के इस खूनी खेल, फार्मा माफिया की लूट और इसके स्थायी समाधान को गहराई से समझने के लिए एन. सिंह की कालजयी पुस्तक ‘अनोखा भारत’ का यह अध्याय हर संवेदनशील नागरिक और डॉक्टर को पढ़ना चाहिए।
जब चिकित्सा सेवा न रहकर सबसे क्रूर और बेदर्द व्यापार बन जाए, तो समझ लीजिए कि समाज की अंतरात्मा मर चुकी है। बीमारी भगवान की तरफ से नहीं आती, लेकिन बीमारी का बिल सीधे कॉरपोरेट अस्पतालों के कसाईखाने से आता है।