साहित्य और सिनेमा में किसान — प्रेमचंद के 'होरी' से बिमल रॉय की 'दो बीघा ज़मीन' तक
एन. सिंह · ·6 मिनट
भारतीय समाज में जब भी किसी शोषित, लाचार परंतु स्वाभिमानी किसान की कल्पना की जाती है, तो दो कालजयी छवियां हर संवेदनशील भारतीय के मानस पटल पर बिजली की तरह कौंध जाती हैं।
पहली छवि है—मुंशी प्रेमचंद के अमर उपन्यास ‘गोदान’ (1936) के नायक ‘होरी’ की। वह होरी, जिसका जीवन भर केवल एक ही सपना था कि उसके दरवाजे पर भी एक गाय बंधी हो। वह रात-दिन खेत में पसीना बहाता है, जमींदार का लगान भरता है, पटवारी और महाजन का ब्याज चुकाता है, और अंत में भरी दोपहरी में लू लगने से सड़क किनारे तड़प-तड़प कर दम तोड़ देता है। मरते समय जब पंडित जी कहते हैं कि “गोदान करो तभी मुक्ति मिलेगी”, तो उसकी पत्नी धनिया अपनी फटी धोली के पल्लू से बीस आने के सिक्के निकालकर पंडित जी के चरणों में रखकर रोते हुए कहती है—“महाराज! घर में न गाय है, न बछिया, न पैसा। यही बीस आने पैसे हैं, यही इनका गोदान है!”
और दूसरी छवि है—बिमल रॉय की 1953 की विश्वप्रसिद्ध कालजयी फिल्म ‘दो बीघा ज़मीन’ के नायक शंभू महतो (बलराज साहनी) की। गाँव का क्रूर जमींदार अपनी मिल बनाने के लिए शंभू की दो बीघा पुश्तैनी ज़मीन हड़पना चाहता है। ज़मीन की नीलामी रोकने के लिए शंभू अपने छोटे बेटे के साथ महानगर कलकत्ता जाता है और धूप-बारिश में नंगे पैर दो-पहिया हाथ-रिक्शा खींचता है। एक सवारी को जल्दी पहुँचाने की होड़ में वह इतनी तेज़ रिक्शा दौड़ाता है कि उसका दिल फट जाता है, रिक्शा पलट जाता है और वह सड़क पर गिरकर खून की उल्टियां करने लगता है। अंत में जब वह गाँव लौटता है, तो देखता है कि उसकी दो बीघा ज़मीन पर एक विशालकाय चिमनी धुआं उगल रही है; वह अपनी ज़मीन से एक मुट्ठी मिट्टी उठाना चाहता है, तो दरबान उसे धक्का देकर भगा देता है!
एन. सिंह अपनी कालजयी पुस्तक ‘उजड़ती खेती, उजड़ते गाँव’ के अध्याय 2 (‘किसान जीवन के दर्द की त्रिवेणी: साहित्य, कविता और सिनेमा में किसान’) में पूछते हैं: आज़ादी के 78 वर्षों बाद भी क्या हमारे देश का किसान होरी और शंभू महतो की उस भयानक नियति से बाहर निकल पाया है? या फिर केवल जमींदार का चेहरा बदल गया है—पहले लाला और पटवारी थे, आज बैंक के रिकवरी एजेंट और कॉर्पोरेट रियल एस्टेट बिल्डर हैं?
कविता में किसान: केदारनाथ अग्रवाल और नागार्जुन का आक्रोश
एन. सिंह बताते हैं कि साहित्यकारों ने केवल आँसू नहीं बहाए, बल्कि व्यवस्था के खिलाफ बारूद भी बोया:
- केदारनाथ अग्रवाल का ‘किसान स्तवन’:
कवि केदारनाथ अग्रवाल ने किसान के श्रम को ईश्वर की साधना से बड़ा बताते हुए लिखा:
“लोहे के धधकते हुए तवे पर झुलसने के लिए खूबसूरत हाथ की तरह…
वह धूप में जलता है, वह जाड़े में ठिठुरता है,
वह धरती का सीना चीरकर दुनिया के लिए सोना उगाता है,
और खुद भूखे पेट फटी चटाई पर सो जाता है!” - जनकवि नागार्जुन की ललकार: नागार्जुन ने आज़ादी के बाद के नेताओं के ढोंग पर चोट करते हुए लिखा था कि खादी के चमकीले वस्त्र पहनने वाले नेताओं ने किसान के पसीने को अपनी तिजोरियों में बंद कर दिया है।
- सिनेमा की त्रिवेणी: ‘मदर इंडिया’ और ‘उपकार’:
- महबूब खान की ‘मदर इंडिया’ (1957) में राधा (नरगिस) कंगन गिरवी रखकर लाला सुखीराम के क्रूर कर्ज़ के जाल से लड़ती है।
- मनोज कुमार की ‘उपकार’ (1967) में शास्त्री जी के नारे ‘जय जवान, जय किसान’ को पर्दे पर उतारा गया, जहाँ एक भाई सीमा पर पहरा देता है और दूसरा भाई खेत में हल चलाता है।
साहित्य व सिनेमा का किसान बनाम 21वीं सदी का वर्तमान यथार्थ
| कालखंड / माध्यम | किसान का प्रमुख संघर्ष | व्यवस्था का क्रूर चेहरा |
|---|---|---|
| गोदान (1936) | सामंती लगान, महाजनी ब्याज और धर्म का पाखंड | जमींदार, पटवारी, साहूकार और पुरोहित |
| दो बीघा ज़मीन (1953) | औद्योगीकरण के लिए उपजाऊ ज़मीन का जबरन अधिग्रहण | मिल मालिक, कचहरी के बाबू और महानगर की अमानवीयता |
| मदर इंडिया (1957) | प्राकृतिक आपदा (बाढ़/सूखा) और बंधुआ मजदूरी | सूदखोर लाला सुखीराम और चक्रवृद्धि ब्याज |
| वर्तमान 21वीं सदी | रासायनिक खाद, बीज की लागत, झूठा एमएसपी और कॉर्पोरेट कॉन्ट्रैक्ट | मंडी के दलाल, बैंक की कुर्की, और दिल्ली की सीमाओं पर कील-कांटे |
किताब से कड़वा सच: एन. सिंह की मार्मिक अंतर्दृष्टि
लेखक एन. सिंह अपनी पुस्तक ‘उजड़ती खेती, उजड़ते गाँव’ के अध्याय 2 में लिखते हैं:
“साहित्य और सिनेमा केवल मनोरंजन नहीं हैं; वे समाज के दबे हुए आंसुओं का आइना हैं। जब बिमल रॉय की ‘दो बीघा ज़मीन’ में शंभू अपनी दो बीघा ज़मीन बचाने के लिए कलकत्ता की सड़कों पर रिक्शा खींचते हुए खून की उल्टियां करता है, तो वह केवल एक फिल्म का दृश्य नहीं होता; वह भारत के हर किसान के सीने पर चलने वाला वो पहिया है जिसे हमारी आधुनिक व्यवस्था आज भी चला रही है। प्रेमचंद का गोदान आज से 90 साल पहले लिखा गया था, लेकिन आज भी जब विदर्भ या बुंदेलखंड का कोई किसान पचास हजार के कर्ज़ के लिए फांसी लगाता है, तो मुझे लगता है कि होरी आज भी मरा नहीं है, वह रोज़ हमारे बीच मर रहा है! जिस दिन समाज साहित्य में लिखे आंसुओं को केवल ‘कहानी’ समझना बंद करके उसे ‘व्यवस्था की चेतावनी’ समझने लगेगा, उसी दिन भारत का किसान आज़ाद होगा!”
— एन. सिंह (उजड़ती खेती, उजड़ते गाँव, पृष्ठ 18-19)
कला और यथार्थ के सेतु: समाज के लिए चार संदेश
- अन्नदाता की मानवीय गरिमा की पुनर्स्थापना: किसान को दया या दान का पात्र न समझा जाए; उसे देश की अर्थव्यवस्था का सबसे सम्मानित उत्पादक माना जाए।
- कर्ज़ के संस्थागत जाल से पूर्ण मुक्ति: साहूकारी और सूक्ष्म-ऋण (Micro-finance) माफिया के शोषण से किसानों को बचाने के लिए ब्याज-मुक्त कृषि ऋण की गारंटी हो।
- भूमि अधिग्रहण कानूनों में किसान की सहमति अनिवार्य: किसी भी उद्योग या हाईवे के लिए बहुफसली उपजाऊ ज़मीन का अधिग्रहण किसान की 80% सहमति और बाज़ार दर से चार गुना मुआवजे के बिना न हो।
- पाठ्यक्रम में किसान साहित्य का समावेश: स्कूलों और कॉलेजों में प्रेमचंद, केदारनाथ अग्रवाल और फणीश्वरनाथ ‘रेणु’ के उपन्यासों को अनिवार्य रूप से पढ़ाया जाए ताकि नई पीढ़ी अपनी मिट्टी की खुशबू और दर्द से जुड़ सके।
एक विचारणीय सवाल (पुस्तक का संदेश)
क्या हम प्रेमचंद के ‘गोदान’ और बिमल रॉय की ‘दो बीघा ज़मीन’ को केवल परीक्षाओं में पास होने के लिए पढ़ते रहेंगे, या उस अभागे होरी और शंभू को सचमुच न्याय दिलाने के लिए अपनी आवाज़ बुलंद करेंगे?
साहित्य, कविता और सिनेमा के माध्यम से किसान के अंतर्मन और उसकी ऐतिहासिक लड़ाई को समझने के लिए एन. सिंह की चर्चित पुस्तक ‘उजड़ती खेती, उजड़ते गाँव’ का यह दूसरा अध्याय हर संवेदनशील साहित्य-प्रेमी और नागरिक को ज़रूर पढ़ना चाहिए।
साहित्य और सिनेमा केवल मनोरंजन नहीं हैं; वे समाज के दबे हुए आंसुओं का आइना हैं। जब बिमल रॉय की 'दो बीघा ज़मीन' में शंभू अपनी दो बीघा ज़मीन बचाने के लिए कलकत्ता की सड़कों पर रिक्शा खींचते हुए खून की उल्टियां करता है, तो वह केवल एक फिल्म का दृश्य नहीं होता; वह भारत के हर किसान के सीने पर चलने वाला वो पहिया है जिसे हमारी आधुनिक व्यवस्था आज भी चला रही है।