जन्म नहीं, आचरण से ब्राह्मण — जातिवाद के खोखलेपन पर तथागत की चोट
एन. सिंह · ·5 मिनट
प्राचीन भारत की सामाजिक व्यवस्था की सबसे बड़ी विसंगति और अभिशाप रहा है—जन्मना जाति व्यवस्था। किसी कुल-विशेष में जन्म लेने मात्र से एक व्यक्ति को पूज्य, श्रेष्ठ और समाज का नियंता मान लिया गया, जबकि दूसरे कुल में जन्म लेने वाले निष्पाप मनुष्य को अछूत, हीन और ज्ञान से वंचित कर दिया गया।
तथागत बुद्ध ने जब इस अन्यायपूर्ण वर्ण-व्यवस्था पर विचार किया, तो उन्होंने शब्दों के अर्थ ही बदल दिए। उन्होंने जन्म के आधार पर थोपी गई श्रेष्ठता को सिरे से खारिज किया और ‘ब्राह्मण’ शब्द को जाति-सूचक पहचान से मुक्त करके उसे नैतिक व आध्यात्मिक साधना का सर्वोच्च स्तर बना दिया।
एन. सिंह अपनी पुस्तक ‘बुद्ध धम्म और भारत’ में धम्मपद के सुप्रसिद्ध ‘ब्राह्मण वर्ग’ की व्याख्या करते हुए लिखते हैं:
‘न जटाहि न गोत्तेन न जच्चा होति ब्राह्मणो।
यम्हि सच्चं च धम्मो च सो सुची सो च ब्राह्मणो।।
(न तो जटाओं से, न गोत्र से, और न ही कुल व जन्म से कोई ब्राह्मण होता है। जिसमें सत्य प्रतिष्ठित है और जिसमें धम्म विद्यमान है, वही पवित्र है और वही सच्चा ब्राह्मण है।)
बुद्ध ने परम्परागत ब्राह्मणवाद की जड़ों को हिला दिया। वे कहते हैं: तुम अपने सिर पर जटाएं रख लो, मृगचर्म पहन लो, यज्ञोपवीत धारण कर लो, बड़े-बड़े गोत्रों की वंशावली सुना दो—इससे कोई ब्राह्मण नहीं बनता। यदि भीतर वासनाओं का मैल भरा है, तो बाहर की जटाएं व्यर्थ हैं। जो राग, द्वेष और मोह से परे है, जो किसी भी प्राणी को कष्ट नहीं पहुंचाता, बुद्ध उसे ब्राह्मण कहते हैं।’*
— ‘बुद्ध धम्म और भारत’ (गाथा-३२९ एवं ब्राह्मण वर्ग विवेचन)
तथागत का संघ: जहाँ नदियां मिलकर समुद्र बन जाती हैं
बुद्ध केवल उपदेश देने वाले दार्शनिक नहीं थे, वे व्यवस्था-परिवर्तन के प्रणेता थे। उन्होंने अपने भिक्षु संघ के दरवाजे समाज के सबसे तिरस्कृत और हाशिए के लोगों के लिए खोल दिए:
- उपालि का उदाहरण: उपालि एक नाई (क्षौरकार) थे, जिन्हें तत्कालीन समाज अत्यंत नीची जाति का मानता था। जब शाक्य कुल के राजकुमारों—अनिरुद्ध, भद्दिय और आनंद ने संन्यास लिया, तो बुद्ध ने उपालि को उनसे पहले दीक्षा दी, ताकि अहंकारी क्षत्रिय राजकुमारों को उपालि के चरणों में झुककर वंदना करनी पड़े।
- सुनीति भंगी का उद्धार: सुनीति राजगृह की सड़कों से मैला उठाने का काम करता था। समाज के तथाकथित उच्च वर्ग के लोग उसकी छाया से भी दूर भागते थे। बुद्ध स्वयं उसकी गली में गए और उसे संघ में शामिल कर अर्हत् पद तक पहुंचाया।
- गंगा, यमुना और समुद्र का दृष्टांत: बुद्ध ने कहा—“जैसे गंगा, यमुना, अचिरावती और सरयू नदियां जब तक अलग-अलग बहती हैं, तब तक उनके अलग-अलग नाम होते हैं; परंतु जैसे ही वे महासमुद्र में गिरती हैं, वे अपनी पुरानी पहचान खोकर केवल ‘महासमुद्र’ बन जाती हैं। उसी प्रकार, क्षत्रिय, ब्राह्मण, वैश्य और शूद्र—जब वे तथागत के धम्म और विनय में प्रविष्ट होते हैं, तो वे अपनी जातियां खोकर केवल ‘शाक्यपुत्रीय श्रमण’ बन जाते हैं।”
जातिवाद: भारतीय प्रतिभा का सबसे बड़ा हत्यारा
जाति व्यवस्था ने भारत का जो अहित किया है, उसकी भरपाई सहस्राब्दियों में भी संभव नहीं हो सकी:
- श्रम का विभाजन नहीं, श्रमिकों का विभाजन: बाबासाहेब आंबेडकर ने ठीक ही कहा था कि यह व्यवस्था श्रम का विभाजन नहीं, बल्कि श्रमिकों का अप्राकृतिक और अपमानजनक विभाजन है। इसने जूते बनाने वाले, कपड़ा बुनने वाले और खेत जोतने वाले मेहनतकशों को हीन घोषित कर दिया, और मुफ्तखोरी करने वाले परजीवियों को पूजनीय बना दिया।
- ज्ञान का एकाधिकार: ज्ञान और शिक्षा को कुछ जातियों की बपौती बनाकर देश की 85% आबादी की बौद्धिक प्रतिभा का गला घोंट दिया गया।
- राष्ट्रीय एकता का अभाव: जब तक समाज सैकड़ों जातियों और उपजातियों के खानों में बंटा रहेगा, तब तक एक सुदृढ़ और समरस राष्ट्र का निर्माण असंभव है।
सच्चा ब्राह्मणत्व क्या है? बुद्ध का पैमाना
धम्मपद के ब्राह्मण वर्ग में तथागत ने सच्चे साधक के जो लक्षण बताए हैं, वे आज के हर नागरिक के लिए मार्गदर्शक हैं:
- अक्रोध: जो गाली और प्रहार के बदले में भी मन में द्वेष नहीं पालता।
- निर्भयता: जो सत्य बोलने के लिए किसी राजा या पुरोहित के दंड से नहीं डरता।
- अपरिग्रह: जिसने अपनी आवश्यकताएं न्यूनतम कर ली हैं और जो दूसरों के श्रम पर विलासिता नहीं करता।
- मैत्री: जो संसार के समस्त प्राणियों—कीट-पतंगों से लेकर मनुष्यों तक—के प्रति एक समान करुणा रखता है।
आज हमारी भूमिका क्या होनी चाहिए?
- जाति-सूचक उपनामों का त्याग: अपने नामों के पीछे जातिसूचक उपनाम लगाने की मानसिकता से बाहर निकलें और मानवीय पहचान को प्राथमिकता दें।
- रोटी-बेटी के संबंधों में जाति की दीवार तोड़ना: विवाह और सामाजिक मेलजोल में जाति की बेड़ियों को तोड़कर अंतर्जातीय विवाहों को प्रोत्साहित करें।
- योग्यता और मानवीय गरिमा का सम्मान: किसी भी व्यक्ति का मूल्यांकन उसके जन्म, कुल या उपनाम से नहीं, बल्कि उसके ज्ञान, परिश्रम, शील और चरित्र से करें।
एक विचारणीय सवाल
यदि ईश्वर ने सबको एक समान लहू, एक समान हड्डियां और एक समान सांसें दी हैं, तो फिर किसी का जन्म ‘पवित्र’ और किसी का ‘अपवित्र’ कैसे हो सकता है?
जन्म के अहंकार को चूर-चूर कर सच्ची मानवीय समानता का दर्शन समझने के लिए पुस्तक ‘बुद्ध धम्म और भारत’ का अध्ययन हर न्यायप्रिय नागरिक के लिए अनिवार्य है।
न तो जटाओं से, न गोत्र से और न ही जन्म से कोई ब्राह्मण होता है। जिसमें सत्य है और धर्म है, वही शुचि है और वही वास्तविक ब्राह्मण है।