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कोटे के भीतर कोटा — ईंट ढोने और खेत जोतने वाली महिला को क्या मिलेगा?

एन. सिंह · ·6 मिनट

जब संसद में नारी शक्ति वंदन अधिनियम (महिला आरक्षण बिल) पेश हुआ, तो पूरे देश में एक नई और तीव्र बहस छिड़ गई—‘कोटे के भीतर कोटा’ (Quota within Quota)।

विपक्षी दलों और सामाजिक न्याय की वकालत करने वाले विचारकों ने यह सवाल उठाया कि इस 33% महिला आरक्षण में अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के लिए तो संविधान के अनुसार पहले से लागू आरक्षण के अनुपात में सीटें होंगी, परंतु अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) और अल्पसंख्यक महिलाओं के लिए कोई अलग उप-कोटा क्यों नहीं रखा गया?

यह प्रश्न भारतीय समाज की बहुस्तरीय असमानता के मर्म को छूता है।

क्योंकि भारत में ‘महिला’ कोई एक समान, सजातीय (Homogeneous) वर्ग नहीं है। एक महिला वह है जो दिल्ली के खान मार्केट में बैठकर लाखों के डिजाइनर कपड़े पहनती है, विदेशों में पढ़ी है और अंग्रेजी में नारीवाद पर भाषण देती है। और दूसरी महिला वह है जो बुंदेलखंड की तपती दोपहरी में सिर पर गारे की तगाड़ी उठाती है, या धान के खेत में कमर झुकाए बारह घंटे काम करके सौ रुपये दिहाड़ी पाती है।

क्या इन दोनों महिलाओं के संघर्ष, समस्याएं और संसद तक पहुँचने के अवसर एक जैसे हो सकते हैं? कभी नहीं!


सामाजिक यथार्थ: कोटे के भीतर कोटे की तार्किक आवश्यकता

यदि महिला आरक्षण को बिना किसी आंतरिक संतुलन के खुला छोड़ दिया जाए, तो उसके क्या परिणाम होंगे?

  1. अभिजात्य महिलाओं का एकाधिकार: भारतीय राजनीति का कटु सत्य यह है कि चुनाव लड़ना आज करोड़ों रुपयों का खेल बन चुका है। ऐसे में जिस महिला के पास पारिवारिक दौलत, अंग्रेजी मीडिया का समर्थन और संभ्रांत सामाजिक नेटवर्क होगा, वही पार्टियां उसे टिकट देंगी।
  2. शोषित वर्ग की महिला की दोहरी मार: दलित, अति-पिछड़ी और पसमांदा मुस्लिम महिलाएं सदियों से दोहरे शोषण का शिकार रही हैं—एक तो महिला होने के नाते पितृसत्ता का शोषण, और दूसरा निचली जाति में जन्म लेने के नाते सामाजिक व आर्थिक भेदभाव का शोषण। यदि उनके लिए संसद में अलग खिड़की नहीं होगी, तो वे कभी संसद की सीढ़ियां नहीं चढ़ पाएंगी।
  3. स्थानीय निकायों का अनुभव: पंचायतों में देखा गया है कि जहां ओबीसी या एससी आरक्षण नहीं था, वहां लगभग सभी सीटें गाँव की प्रभुत्वशाली और उच्च जातियों के परिवारों की महिलाओं ने कब्जा लीं।

उप-कोटा विवाद: दोनों पक्षों के मुख्य तर्क

आयाम उप-कोटे के पक्ष में तर्क (सामाजिक न्याय) उप-कोटे के विपक्ष में तर्क (एकीकृत दृष्टिकोण)
मूल अवधारणा भारत में जातिगत विषमता लैंगिक विषमता से कहीं अधिक गहरी है। महिलाओं को जातियों में बांटने से महिला एकता और आंदोलन कमज़ोर होगा।
प्रतिनिधित्व 50% से अधिक आबादी वाली ओबीसी महिलाओं को संसद में आवाज़ मिलेगी। संविधान में मूल रूप से लोकसभा में ओबीसी आरक्षण का प्रावधान नहीं है।
ज़मीनी प्रभाव ईंट भट्ठों और खेतों में काम करने वाली जातियों का सशक्तिकरण होगा। जातियों के नए झगड़े शुरू होंगे और बिल दशकों तक लटका रहेगा।
अंतिम लक्ष्य सत्ता के सर्वोच्च स्तर पर सभी सामाजिक वर्गों की आनुपातिक हिस्सेदारी। योग्यता और नागरिक क्षमता के आधार पर महिलाओं का स्वतः उत्थान।

किताब से कड़वा सच: एन. सिंह की संतुलित और निर्भीक दृष्टि

लेखक एन. सिंह अपनी पुस्तक ‘गिनती से सत्ता तक’ के अध्याय ‘कोटे के भीतर कोटा’ में इस अत्यंत संवेदनशील मुद्दे पर दोनों पक्षों के पाखंड को उजागर करते हुए लिखते हैं:

“यदि महिला आरक्षण के भीतर अत्यंत पिछड़ी और शोषित महिलाओं को अलग संरक्षण नहीं मिला, तो संसद की 33% सीटों पर केवल महानगरों की उच्च-वर्गीय, अंग्रेजीदां और कॉर्पोरेट अभिजात्य महिलाएं ही काबिज हो जाएंगी। लेकिन इसके साथ ही दूसरा कड़वा सच यह भी है कि जो नेता आज ‘कोटे के भीतर कोटे’ के नाम पर बिल फाड़ते रहे हैं, उनकी अपनी पार्टियों में कितनी गरीब और अति-पिछड़ी महिलाओं को संगठन में पद या टिकट दिए गए हैं? जब अपनी पार्टी में टिकट बांटने की बारी आती है, तो वे अपने ही परिवार की महिलाओं को आगे कर देते हैं! उप-कोटे की मांग न्याय की पुकार होनी चाहिए, बिल को हमेशा के लिए लटकाने का बहाना नहीं।”
— एन. सिंह (गिनती से सत्ता तक, पृष्ठ 158-159)

लेखक आगे एक बहुत मार्मिक अवलोकन प्रस्तुत करते हैं:

“चाहे अगड़ी महिला हो या पिछड़ी महिला—जब तक समाज में पुरुष की सोच नहीं बदलेगी, तब तक दोनों का शोषण होता रहेगा। अगड़ी महिला का शोषण ड्राइंग रूम में सोफिस्टिकेटेड तरीके से होता है, और गरीब पिछड़ी महिला का शोषण खेत की मेड़ पर डंडे के जोर पर होता है। दर्द दोनों का साझा है, लेकिन संसद तक पहुँचने के रास्ते अलग-अलग हैं।”
— (गिनती से सत्ता तक, पृष्ठ 162)


एक व्यावहारिक और न्यायसंगत समाधान

  1. आनुपातिक उप-वर्गीकरण (Proportional Sub-Categorization): जिस प्रकार 33% के भीतर एससी और एसटी महिलाओं को आनुपातिक आरक्षण दिया गया है, उसी प्रकार नीतिगत स्तर पर राजनीतिक दलों के लिए यह अनिवार्य किया जाए कि वे अपने कुल महिला टिकटों में से कम से कम 50% टिकट ओबीसी और अति-पिछड़े वर्गों की महिलाओं को दें।
  2. आर्थिक आधार पर प्राथमिक वरीयता: आरक्षित कोटे के भीतर भी उन महिलाओं को पहली प्राथमिकता दी जाए जिनके परिवार की वार्षिक आय आयकर सीमा से कम है और जो स्वयं असंगठित क्षेत्र या कृषि में काम करती हैं।
  3. महिला स्वयं सहायता समूहों (SHGs) को राजनीतिक नर्सरी बनाना: देश में 10 करोड़ से अधिक महिलाएं स्वयं सहायता समूहों से जुड़ी हैं। ये महिलाएं ज़मीन पर माइक्रो-फाइनेंस और ग्रामीण विकास संभालती हैं। पार्टियों को अपने उम्मीदवार इन समूहों की लीडर महिलाओं में से चुनने चाहिए।

एक विचारणीय सवाल (पुस्तक का संदेश)

क्या संसद में बैठने वाली महिला केवल किसी खास वर्ग का चेहरा होगी, या वह उस दिन का इंतज़ार कर रही मजदूरिन की आवाज़ बनेगी जिसके हाथ की छाले देश का अन्न पैदा करते हैं?

महिला आरक्षण के भीतर के इन जटिल सामाजिक समीकरणों, अंतर्विरोधों और भविष्य की दिशा को समझने के लिए एन. सिंह की चर्चित पुस्तक ‘गिनती से सत्ता तक: भारत का अनकहा युद्ध’ का यह अध्याय हर विचारशील नागरिक को पढ़ना चाहिए।

यदि महिला आरक्षण के भीतर अत्यंत पिछड़ी और शोषित महिलाओं को अलग संरक्षण नहीं मिला, तो संसद की 33% सीटों पर केवल महानगरों की उच्च-वर्गीय, अंग्रेजीदां और कॉर्पोरेट अभिजात्य महिलाएं ही काबिज हो जाएंगी।

आज़ाद कलम — एन. सिंह

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