'India that is भारत' — केवल नाम का विवाद या 5000 साल की सभ्यता का स्वाभिमान?
एन. सिंह · ·5 मिनट
सितंबर 2023 में जब जी-20 शिखर सम्मेलन के आधिकारिक निमंत्रण पत्रों पर ‘प्रेसिडेंट ऑफ इंडिया’ के स्थान पर ‘प्रेसिडेंट ऑफ भारत’ लिखा गया, तो पूरे देश के राजनीतिक गलियारों और सोशल मीडिया पर एक भयानक तूफान खड़ा हो गया।
सत्तारूढ़ दल ने इसे औपनिवेशिक दासता की मानसिकता से मुक्ति और 5000 साल पुरानी सांस्कृतिक अस्मिता की पुनर्प्रतिष्ठा घोषित किया; जबकि विपक्षी दलों ने आरोप लगाया कि सरकार विपक्षी गठबंधन के नाम ‘इण्डिया’ (I.N.D.I.A.) से डरकर देश के संवैधानिक नाम से छेड़छाड़ कर रही है।
परंतु क्या यह विवाद केवल आज की चुनावी राजनीति की देन है?
एन. सिंह अपनी कालजयी पुस्तक ‘अनोखा भारत’ के अध्याय 7 (‘देश का पुनर्गठन’) में इस ऐतिहासिक द्वंद्व की जड़ों में उतरते हुए बताते हैं कि यह विवाद आज का नहीं, बल्कि 18 सितंबर 1949 को संविधान सभा के उस ऐतिहासिक सत्र से शुरू हुआ था, जब संविधान के अनुच्छेद 1 पर मतदान हो रहा था!
संविधान सभा की वह भूली हुई ऐतिहासिक बहस: 18 सितंबर 1949
संविधान की प्रारूप समिति (Drafting Committee) के अध्यक्ष डॉ. भीमराव अम्बेडकर ने जब मसौदा पेश किया, तो उसमें लिखा था: “India, that is Bharat, shall be a Union of States.”
इस पर संविधान सभा के कई वरिष्ठ स्वतंत्रता सेनानियों ने कड़ा ऐतराज जताया था:
- सेठ गोविंद दास का तर्क: उन्होंने कहा—“दुनिया के किसी भी स्वाभिमानी देश का संविधान यह नहीं कहता कि ‘फलां देश दैट इज फलां देश’। क्या आयरलैंड का संविधान कहता है कि ‘आयरलैंड दैट इज एरे’? हम ऋग्वेद, महाभारत और विष्णु पुराण के उत्तराधिकारी हैं जहाँ स्पष्ट लिखा है: ‘उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्। वर्षं तद्भारतं नाम भारती यत्र संततिः।’ हमारा एकमात्र नाम केवल ‘भारत’ होना चाहिए!”
- कमलापति त्रिपाठी और हरगोविंद पंत की दलील: उन्होंने याद दिलाया कि अंग्रेजों द्वारा दिया गया ‘इंडिया’ नाम सिंधु नदी (इंडस) के ग्रीक और लैटिन उच्चारण की विकृति है। यह नाम गुलामी और विदेशी हुकूमत की याद दिलाता है।
- डॉ. अम्बेडकर का व्यावहारिक दृष्टिकोण: बाबासाहेब ने उस समय बहस को विराम देते हुए कहा कि संयुक्त राष्ट्र और अंतरराष्ट्रीय संधियों में भारत पहले से ‘इंडिया’ नाम से पंजीकृत है, इसलिए व्यावहारिक कारणों से दोनों नामों को स्वीकार किया जाना चाहिए।
‘इंडिया’ बनाम ‘भारत’: केवल नाम नहीं, दो विरोधी विश्व-दृष्टिकोण
लेखक एन. सिंह स्पष्ट करते हैं कि यह लड़ाई केवल अक्षरों की नहीं है; यह भारत के दो परस्पर विरोधी अंतर्विरोधों की लड़ाई है:
| कसौटी | ‘इंडिया’ का विचार (औपनिवेशिक व आधुनिक) | ‘भारत’ का विचार (सभ्यतागत व सांस्कृतिक) |
|---|---|---|
| भौगोलिक केंद्र | दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु जैसे महानगर, मॉल और फाइव स्टार होटल | देहात के 6 लाख गाँव, खेत-खलिहान, आश्रम और नदियां |
| भाषा और सोच | संभ्रांत अंग्रेजी, विदेशी सिद्धांत, उपभोक्तावाद और मुनाफा | मातृभाषाएं (हिंदी, तमिल, बांग्ला, मराठी), लोक-साहित्य और त्याग |
| नागरिक का रिश्ता | देश एक ‘सुविधा केंद्र’ है जहाँ टैक्स देकर सर्विस मांगी जाती है | भूमि एक ‘माता’ है जिसके लिए प्राण न्योछावर करना सौभाग्य है |
| सामाजिक न्याय | संकीर्ण वोट-बैंक, पहचान की राजनीति और पश्चिमी मॉडल | ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ और ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’ का एकात्म भाव |
किताब से कड़वा सच: एन. सिंह की दो टूक समीक्षा
लेखक एन. सिंह अपनी पुस्तक ‘अनोखा भारत’ के अध्याय 7 में लिखते हैं:
“आजकल ‘India that is भारत’ को लेकर भारतीय राजनीति गरमायी हुई है। एक पार्टी दूसरी पार्टी को नीचा दिखाने का प्रयास कर रही है। वर्तमान भारत में हर बिन्दु पर—चाहे वह नाम हो, भाषा हो या इतिहास—केवल चुनावी लाभ तलाशा जाता है। परंतु कड़वा सच यह है कि केवल ‘इंडिया’ को मिटाकर हर जगह ‘भारत’ लिख देने से देश का कायाकल्प नहीं होगा! यदि आपके सरकारी स्कूलों में टाट-पट्टी पर गरीब का बच्चा भूखा बैठा है, यदि किसान की फसल लुट रही है, यदि अस्पतालों में दवाइयां नहीं हैं, तो चाहे आप ‘इंडिया’ कहिए या ‘भारत’ कहिए—जनता की बदहाली का सच नहीं बदलेगा! भारत नाम तब सार्थक होगा जब भारत की सभ्यतागत आत्मा शासन के आचरण में उतरेगी, केवल नेमप्लेट बदलने से नहीं!”
— एन. सिंह (अनोखा भारत, पृष्ठ 62-63)
लेखक आगे शासन की प्राथमिकता पर सवाल उठाते हैं:
“नेताओं ने नाम बदलने को सबसे सस्ता राष्ट्रवाद बना लिया है। रेलवे स्टेशनों, सड़कों और शहरों के नाम बदलने में अरबों रुपये फूंक दिए जाते हैं, लेकिन उसी शहर के सरकारी स्कूल की टपकती छत की मरम्मत के लिए बजट नहीं होता। नाम बदलना आसान है, चरित्र बदलना कठिन!”
— (अनोखा भारत, पृष्ठ 67)
सभ्यतागत स्वाभिमान का वास्तविक रोडमैप: चार सूत्र
- मानसिक दासता का अंत, न कि केवल नाम बदलना: अदालतों, उच्च शिक्षा और प्रशासनिक परीक्षाओं में अंग्रेजी की अनिवार्यता समाप्त कर भारतीय भाषाओं को ज्ञान और तकनीक की भाषा बनाया जाए।
- सभ्यतागत इतिहास का सच्चा पुनर्जागरण: भारत के पाठ्यक्रम में केवल दिल्ली के सुल्तानों और मुगलों का इतिहास न पढ़ाया जाए, बल्कि चोल, अहोम, विजयनगर साम्राज्य, बौद्ध दार्शनिकों और भारतीय वैज्ञानिकों के योगदान को प्राथमिक स्थान मिले।
- गाँव और किसान को विकास का केंद्र बनाना: जब तक ‘भारत’ (गाँव) दरिद्र रहेगा और ‘इंडिया’ (महानगर) चमकता रहेगा, तब तक यह खाई कभी नहीं पटेगी। विकास का बजट गांवों की ओर मोड़ा जाए।
- संवैधानिक मर्यादा और राष्ट्रीय एकता: देश के नाम को राजनीतिक दलों के गठबंधनों की खींचतान से ऊपर रखा जाए और इसे दलीय नफ़रत का औजार बनने से रोका जाए।
एक विचारणीय सवाल (पुस्तक का संदेश)
क्या किसी देश की महानता केवल उसके नाम की स्पेलिंग बदलने से तय होगी, या उसके अंतिम नागरिक के चेहरे पर स्वाभिमान और समृद्धि की मुस्कान लाने से?
संविधान के अनुच्छेद 1 की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और सभ्यतागत स्वाभिमान के गहरे अर्थ को समझने के लिए एन. सिंह की चर्चित पुस्तक ‘अनोखा भारत’ का यह सातवां अध्याय हर जागरूक नागरिक को पढ़ना चाहिए।
संविधान सभा में जब 'इंडिया' और 'भारत' पर बहस हुई थी, तो सेठ गोविंद दास और कमलापति त्रिपाठी जैसे विचारकों ने कहा था कि 'इंडिया' नाम अंग्रेजों की गुलामी का प्रतीक है और 'भारत' ऋग्वेद, वायु पुराण और महाभारत की अखंड सांस्कृतिक धारा है। आज जब नाम को लेकर दल आपस में लड़ रहे हैं, तो वे भूल रहे हैं कि जब तक भारत की आत्मा नहीं जागेगी, केवल नाम बदलने से कोई देश महाशक्ति नहीं बनता।