क्या भारतीय संविधान को समीक्षा और पुनरावलोकन की आवश्यकता है? 75 वर्षों में 106 संशोधन
एन. सिंह · ·6 मिनट
भारतीय राजनीति में एक बहुत अजीब और अतार्किक अंधविश्वास पनप चुका है। जब भी कोई प्रबुद्ध नागरिक, न्यायविद या विचारक यह सवाल उठाता है कि क्या हमारे 1950 के संविधान की धाराओं की समग्र समीक्षा (Constitutional Review) की जानी चाहिए—तो तुरंत कुछ राजनीतिक दल सड़कों पर उतरकर चिल्लाने लगते हैं: “संविधान खतरे में है! संविधान बदलने की साजिश हो रही है!”
वे यह भूल जाते हैं कि स्वयं संविधान निर्माता बाबासाहेब डॉ. भीमराव अम्बेडकर ने 25 नवंबर 1949 को संविधान सभा के अपने अंतिम भाषण में क्या कहा था?
बाबासाहेब ने स्पष्ट कहा था:
“मैं महसूस करता हूँ कि संविधान चाहे कितना ही अच्छा क्यों न हो, यदि वे लोग जिन्हें इसे लागू करने का काम सौंपा गया है खराब निकलें, तो संविधान निश्चित रूप से खराब सिद्ध होगा। संविधान मनुष्य द्वारा बनाया गया एक दस्तावेज है; यह कोई अंतिम या अपरिवर्तनीय धर्मग्रंथ नहीं है जिसे आने वाली पीढ़ियां अपनी आवश्यकताओं के अनुसार बदल न सकें!”
एन. सिंह अपनी कालजयी पुस्तक ‘अनोखा भारत’ के अध्याय 18 (‘भारत का संविधान: खतरनाक राष्ट्रविरोधी प्रवृत्तियाँ - वर्तमान में संविधान के पुनरावलोकन की आवश्यकता’) में एक ऐसा साहसिक और गंभीर प्रश्न उठाते हैं: जिस संविधान में पिछले 75 वर्षों में 106 से अधिक बार संशोधन करने पड़े हों, क्या उसमें आज भी 1935 के औपनिवेशिक ब्रिटिश शासन की वही जड़ता मौजूद नहीं है जो आम नागरिक को न्याय दिलाने में विफल रही है?
106 संशोधन: जीवित दस्तावेज या बुनियादी ढाँचे की कमज़ोरी?
विश्व के सबसे पुराने लिखित संविधान—संयुक्त राज्य अमेरिका (USA) के संविधान—को 235 वर्ष बीत चुके हैं, परंतु आज तक उसमें केवल 27 संशोधन हुए हैं!
इसके विपरीत, भारत के संविधान में औसतन हर आठ महीने में एक नया संशोधन करना पड़ा है:
- औपनिवेशिक ब्रिटिश अधिनियम 1935 की छाया: भारतीय संविधान के लगभग 250 से अधिक अनुच्छेद सीधे-सीधे अंग्रेजों के ‘गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट 1935’ से हूबहू लिए गए थे। वह एक्ट भारतीयों पर शासन और नियंत्रण करने के लिए बनाया गया था, नागरिकों को सशक्त करने के लिए नहीं!
- न्यायपालिका की अंतहीन तारीखें और कोलेजियम का एकाधिकार: संविधान निर्माताओं ने कभी नहीं सोचा था कि देश की अदालतों में 5 करोड़ मुकदमे दशकों तक लटके रहेंगे और जज ही जजों को नियुक्त करने वाला एक अपारदर्शी ‘कोलेजियम सिस्टम’ बना लेंगे, जिसका संविधान के मूल पाठ में कहीं कोई जिक्र तक नहीं था!
- दलबदल और भ्रष्ट राजनीति का खुला संरक्षण: 10वीं अनुसूची बनने के बावजूद विधायक और सांसद खुलेआम बिकते हैं और संविधान की कमजोर धाराओं का सहारा लेकर सत्ता बदलते रहते हैं।
संविधान की वर्तमान स्थिति बनाम 21वीं सदी की राष्ट्रीय आवश्यकताएं
| आयाम | 1950 की औपनिवेशिक विरासत | 21वीं सदी की संप्रभु आवश्यकताएं |
|---|---|---|
| प्रशासनिक ढांचा | पुलिस और अफसरशाही जनता पर रौब जमाने वाली औपनिवेशिक मालिक बनी हुई है | पुलिस और ब्यूरोक्रेसी जनता के प्रति 100% जवाबदेह और पारदर्शी सेवक बने |
| न्यायिक जवाबदेही | जजों की नियुक्ति में वंशवाद और भाई-भतीजावाद (कोलेजियम); कोई समयसीमा नहीं | राष्ट्रीय न्यायिक आयोग (NJAC) और मुकदमों के त्वरित निपटारे की 1 वर्ष की गारंटी |
| चुनावी शुचिता | आपराधिक मुकदमों वाले माफिया खुलेआम चुनाव लड़कर कानून बनाते हैं | गंभीर अपराधों के आरोपियों पर तत्काल आजीवन चुनाव प्रतिबंध |
| डिजिटल व आधुनिक अधिकार | डेटा गोपनीयता, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और साइबर अपराधों पर कोई स्पष्ट मौलिक ढांचा नहीं | डेटा संप्रभुता, इंटरनेट स्वतंत्रता और पर्यावरण को मौलिक अधिकारों में जोड़ना |
किताब से कड़वा सच: एन. सिंह की दो टूक समीक्षा
लेखक एन. सिंह अपनी पुस्तक ‘अनोखा भारत’ के अध्याय 18 में लिखते हैं:
“संविधान कोई पत्थर की मूर्ति नहीं है जिसकी केवल पूजा की जाए; संविधान जीवित वृक्ष की तरह है जिसकी सूखी टहनियों को काटना और नई कोंपलों को सींचना पड़ता है। यदि 75 वर्षों में 106 पैच लगाने पड़े हों, तो समझ लीजिए कि मूल कपड़े की सिलाई में कहीं न कहीं बुनियादी समीक्षा की ज़रूरत है। आज संविधान की दुहाई वे लोग सबसे ज्यादा देते हैं जिन्होंने संविधान की आत्मा को हर रोज कुचला है। जब तक संविधान देश के अंतिम गरीब को भूख से, किसान को कर्ज़ से, और युवा को बेरोजगारी से मुक्ति दिलाने का अचूक कानूनी हथियार नहीं बनेगा, तब तक संविधान की पोथी केवल वकीलों की कमाई और नेताओं के भाषणों का आभूषण बनी रहेगी!”
— एन. सिंह (अनोखा भारत, पृष्ठ 194-195)
लेखक आगे जस्टिस वेंकटचलैया आयोग का स्मरण कराते हैं:
“वर्ष 2000 में अटल बिहारी वाजपेयी सरकार ने पूर्व मुख्य न्यायाधीश एम.एन. वेंकटचलैया की अध्यक्षता में ‘संविधान समीक्षा आयोग’ (NCRWC) बनाया था। उस आयोग ने सैकड़ों शानदार सिफारिशें की थीं, परंतु बाद की सरकारों ने उन रिपोर्टों को ठंडे बस्ते में डाल दिया क्योंकि वे सुधार नेताओं और भ्रष्ट बाबुओं के विशेषाधिकार छीन लेते!”
— (अनोखा भारत, पृष्ठ 198)
संविधान समीक्षा के चार मुख्य राष्ट्रीय बिंदु
- न्यायिक नियुक्ति आयोग (NJAC) की पुनर्स्थापना: जजों द्वारा जजों की नियुक्ति का अलोकतांत्रिक कोलेजियम खत्म हो; कार्यपालिका, न्यायपालिका और विपक्ष के साझा पारदर्शी आयोग द्वारा जजों की नियुक्ति हो।
- संसद और विधानसभाओं में 50% उपस्थिति की अनिवार्यता: सांसदों के लिए सदन में न्यूनतम कार्यदिवस और बहस अनिवार्य हो; सदन में हंगामा कर जनता का पैसा बर्बाद करने पर वेतन-भत्ते कटें।
- राइट टू रिकॉल और प्रत्यक्ष जनमत संग्रह (Referendum): बड़े राष्ट्रीय नीतिगत विषयों पर स्विट्जरलैंड की तर्ज पर जनता की सीधी राय लेने का संवैधानिक प्रावधान हो।
- पुलिस सुधार और औपनिवेशिक एक्ट 1861 की पूर्ण समाप्ति: 1861 के पुलिस एक्ट को पूरी तरह कचरे में फेंककर स्वतंत्र, आधुनिक और मानवाधिकारों का सम्मान करने वाली पुलिस संहिता बनाई जाए।
एक विचारणीय सवाल (पुस्तक का संदेश)
क्या संविधान की रक्षा का अर्थ उसकी कमियों पर पर्दा डालना है, या उसे समय के साथ और अधिक सशक्त, न्यायपूर्ण और आधुनिक बनाना है?
संविधान के ऐतिहासिक विकास, 106 संशोधनों के यथार्थ और आवश्यक पुनरावलोकन की गंभीर बहस को समझने के लिए एन. सिंह की चर्चित पुस्तक ‘अनोखा भारत’ का यह अठारहवां अध्याय हर कानूनविद और नागरिक को पढ़ना चाहिए।
संविधान कोई पत्थर की मूर्ति नहीं है जिसकी केवल पूजा की जाए; संविधान जीवित वृक्ष की तरह है जिसकी सूखी टहनियों को काटना और नई कोंपलों को सींचना पड़ता है। यदि 75 वर्षों में 106 पैच लगाने पड़े हों, तो समझ लीजिए कि मूल कपड़े की सिलाई में कहीं न कहीं बुनियादी समीक्षा की ज़रूरत है।