अंगुलिमाल से आम्रपाली तक — सज़ा देने से नहीं, करुणा से समाज बदलने का बुद्ध मार्ग
एन. सिंह · ·4 मिनट
श्रावस्ती के जंगलों में एक भयानक डाकू रहता था, जिसका नाम था अंगुलिमाल।
उसने प्रण लिया था कि वह 1000 लोगों की हत्या करके उनकी उंगलियों की माला पहनेगा। 999 लोगों को वह मार चुका था। उस जंगल के रास्ते से राजा प्रसेनजित की सेना भी गुजरने से कांपती थी।
एक दिन भगवान बुद्ध अकेले, शांत कदमों से उसी घने जंगल की ओर चल पड़े।
दूर से तलवार चमकाते हुए अंगुलिमाल दौड़ा। वह चीखा: “रुक जा सन्यासी! आज तेरी उंगली से मेरी माला पूरी होगी!”
बुद्ध अपनी मंद गति से चलते रहे। अंगुलिमाल ने फिर चिल्लाकर कहा: “अरे संन्यासी, क्या तुझे मौत का डर नहीं? मैंने कहा रुक जा!”
तथागत मुड़े, उनकी आँखों में भय का एक कतरा भी नहीं था, केवल अगाध करुणा थी। बुद्ध ने शांत स्वर में कहा: “अंगुलिमाल! मैं तो सदियों पहले रुक चुका हूँ—हिंसा से, वासना से, लालच से। लेकिन तू कब रुकेगा?”
इन चंद शब्दों ने उस खूंखार हत्यारे के अंतर्मन में बिजली जैसा आघात किया। तलवार उसके हाथ से छूटकर गिर पड़ी। वह रोता हुआ तथागत के चरणों में गिर पड़ा। वही अंगुलिमाल बाद में ‘अहिंसक’ भिक्षु बना और उसने गाँव-गाँव जाकर पीड़ितों की सेवा की।
आम्रपाली: वैशाली की नगरवधू का आत्म-रूपांतरण
उसी तरह वैशाली की अद्वितीय सुंदरी आम्रपाली की कथा है।
वैशाली के कानून के अनुसार, उसकी सुंदरता इतनी अद्भुत थी कि उसे किसी एक व्यक्ति की पत्नी बनने के बजाय पूरे नगर की ‘जनपद कल्याणी’ (नगरवधू) बना दिया गया था। बड़े-बड़े राजा, सामंत और श्रेष्ठी उसके महलों के बाहर कतार लगाए खड़े रहते थे।
जब बुद्ध वैशाली पधारे, तो आम्रपाली उनके दर्शन के लिए पहुँची। तथागत के शांत, वासना-मुक्त मुखमंडल को देखकर उसकी अंतरात्मा हिल गई। उसने बुद्ध को अपने घर भोजन का निमंत्रण दिया।
वैशाली के अमीर लिच्छवि सामंतों ने आम्रपाली से कहा कि “तुम बुद्ध के भोजन का अधिकार हमें बेच दो, हम तुम्हें लाखों स्वर्ण मुद्राएं देंगे।” लेकिन आम्रपाली ने मुस्कुराकर इंकार कर दिया।
बुद्ध ने लिच्छवियों के महलों का निमंत्रण छोड़कर उस तथाकथित ‘पतित’ स्त्री के घर भोजन स्वीकार किया। और उसी दिन आम्रपाली ने अपना विशाल आम्रकुंज (आमों का बगीचा) बौद्ध संघ को दान कर दिया और स्वयं भिक्षुणी बनकर अर्हत पद प्राप्त किया।
किताब से कड़वा सच
अपनी पुस्तक ‘बुद्ध धम्म और भारत’ में लेखक नथुनी सिंह ‘कोदन्ना’ इस मनोवैज्ञानिक क्रांति का विश्लेषण करते हैं:
“हमारा समाज हमेशा अपराधियों को फांसी पर लटकाने और तथाकथित चरित्रहीन स्त्रियों को पत्थरों से मारने में अपनी न्यायप्रियता समझता है। लेकिन दण्ड कभी भी अपराध की जड़ को खत्म नहीं कर सकता। बुद्ध ने दिखाया कि कोई भी मनुष्य केवल पापी या हत्यारा नहीं होता; उसके भीतर परिस्थितियों, अज्ञान और वासना का अंधकार होता है। यदि उस पर प्रेम और करुणा का प्रकाश डाला जाए, तो सबसे बड़ा हिंसक भी सबसे बड़ा संत बन सकता है। बुद्ध का यह सुधारवादी दृष्टिकोण आधुनिक न्यायशास्त्र (Restorative Justice) की सबसे ऊंची चोटी है।”
— ‘बुद्ध धम्म और भारत’ (भाग-१, पृष्ठ 28-31)
असली समाधान क्या है?
- न्याय व्यवस्था में सुधारवादी दृष्टिकोण: जेलों को यातना-गृह बनाने के बजाय सुधार-गृह बनाया जाए, जहाँ कैदियों को ध्यान (विपश्यना), शिक्षा और कौशल सिखाकर मुख्यधारा में वापस लाया जाए।
- सामाजिक कलंक (Social Stigma) का अंत: गलतियों की सज़ा भुगत चुके व्यक्तियों और वेश्यावृत्ति के दलदल से निकलने वाली महिलाओं को समाज में सम्मानजनक रोज़गार और स्वीकार्यता मिले।
- कटुता के बदले संवाद: पारिवारिक और सामाजिक विवादों में प्रतिशोध लेने के बजाय क्षमा और सुलह का मार्ग चुना जाए।
एक विचारणीय सवाल (पुस्तक का संदेश)
यदि आज का समाज अंगुलिमाल जैसे भटके हुए युवाओं को केवल गोलियों से भूनने के बजाय तथागत की तरह करुणा से सुनना सीख ले, तो क्या हमारे देश से नक्सलवाद, अपराध और हिंसा का अंत नहीं हो सकता?
हृदय-परिवर्तन की इस अमर गाथा को समझने के लिए पुस्तक ‘बुद्ध धम्म और भारत’ का यह प्रसंग अवश्य पढ़ें।
घृणा को घृणा से नहीं काटा जा सकता; पापी से नफ़रत करना आसान है, लेकिन उसके भीतर छिपे मनुष्य को जगा देना ही बुद्धत्व की वास्तविक पराकाष्ठा है।