क्या भारत आज भी 'सोने की चिड़िया' है? देसी-विदेशी पूंजी की नई लूट
एन. सिंह · ·6 मिनट
बचपन से स्कूल की किताबों में हमें यह गौरवशाली इतिहास पढ़ाया जाता है कि प्राचीन काल में भारत ‘सोने की चिड़िया’ था। यहाँ दूध-दही की नदियां बहती थीं, विश्व के कुल व्यापार का एक तिहाई हिस्सा भारत के पास था, और दुनिया भर के व्यापारी भारत के मसाले, सूती वस्त्र और रत्न खरीदने आते थे।
फिर इतिहासकार हमें बताते हैं कि पहले महमूद गजनवी और मुगलों ने इस सोने की चिड़िया के पंख काटे, और बाद में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने दो सौ सालों में भारत से लगभग 45 ट्रिलियन डॉलर (3,700 लाख करोड़ रुपये) की अकूत दौलत लूटकर लंदन पहुंचा दी और भारत को कंगाली के कगार पर छोड़ गई।
यह इतिहास हम सबको कंठस्थ है।
परंतु लेखक एन. सिंह अपनी पुस्तक ‘अनोखा भारत’ में एक ऐसा प्रश्न दागते हैं जो किसी भी राष्ट्रप्रेमी की अंतरात्मा को चीर कर रख देता है: 1947 में जब गोरे अंग्रेज चले गए, तो क्या भारत की उस ‘सोने की चिड़िया’ की लूट बंद हो गई? या फिर केवल लुटेरों के चेहरे बदल गए—अंग्रेजों की जगह हमारे अपने देसी उद्योगपतियों, भ्रष्ट नेताओं और अंतरराष्ट्रीय कॉर्पोरेट सिंडिकेट ने ले ली?
नव-उदारवाद और क्रोनी कैपिटलिज्म: लूट का नया आधुनिक चेहरा
1991 के बाद देश में आर्थिक उदारीकरण (LPG) के नाम पर जो नीतियां लागू की गईं, उन्होंने भारतीय अर्थव्यवस्था का पूरा चरित्र बदल दिया। विकास हुआ, सड़कें बनीं, तकनीक आई; परंतु इसके साथ ही भारतीय संसाधनों की ऐसी निर्मम कॉर्पोरेट लूट शुरू हुई जिसने ईस्ट इंडिया कंपनी को भी पीछे छोड़ दिया:
- जल, जंगल, ज़मीन और खदानों की कौड़ियों के भाव नीलामी: देश की कोयला खदानें, लौह अयस्क, बॉक्साइट, प्राकृतिक गैस, हवाई अड्डे, बंदरगाह और बिजली ग्रिड—सब कुछ गिने-चुने 4-5 बड़े कॉर्पोरेट घरानों की झोली में डाल दिया गया। आदिवासियों को उनकी पुश्तैनी ज़मीनों से बंदूक की नोक पर बेदखल कर दिया गया।
- लाखों करोड़ के बैंक लोन (NPA) की माफी: आम किसान यदि 50 हजार रुपये का ट्रैक्टर का कर्ज़ न चुका पाए, तो बैंक उसके घर की कुर्की कर लेता है, उसे जेल में डाल देता है और अखबार में उसका फोटो छापकर बेइज्जत करता है। परंतु जब बड़े-बड़े कॉर्पोरेट अरबपति बैंकों के 15 लाख करोड़ रुपये से अधिक के कर्ज़ डकार जाते हैं, तो सरकारें उसे ‘राइट-ऑफ’ (Writ-off) करके चुपचाप बट्टे खाते में डाल देती हैं!
- टैक्स की दोहरी नीति: देश के 140 करोड़ आम लोग सुई से लेकर आटे-दाल तक हर चीज़ पर भारी जीएसटी (GST) चुकाते हैं। इसके विपरीत, बड़ी-बड़ी कॉर्पोरेट कंपनियों का कॉर्पोरेट टैक्स 30% से घटाकर 22% कर दिया जाता है और उन्हें अरबों की पीएलआई (PLI) सब्सिडी बांटी जाती है।
औपनिवेशिक ब्रिटिश लूट बनाम आधुनिक कॉर्पोरेट लूट
| पैमाना | ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की लूट | आधुनिक क्रोनी कैपिटलिज्म की लूट |
|---|---|---|
| लुटेरे का स्वरूप | विदेशी गोरे आक्रांता और व्यापारी | अपने ही देश के चुनिंदा अरबपति और उनके राजनीतिक आका |
| लूट का तरीका | खुला सैनिक दमन, लगान और जहाजों से खजाना ले जाना | कानून बनाकर, नीतियां बदलकर, खदानों और बैंकों का पैसा हड़पना |
| जनता की स्थिति | अकाल और भुखमरी से लाखों मौतें | भयंकर कुपोषण, बेरोज़गारी, महँगाई और युवाओं में लाचारी |
| न्याय और विरोध | विरोध करने पर फांसी और काला पानी | विरोध करने वालों को ‘देशद्रोही’, ‘नक्सली’ या ‘विकास-विरोधी’ घोषित करना |
किताब से कड़वा सच: एन. सिंह का आर्थिक विश्लेषण
लेखक एन. सिंह अपनी पुस्तक ‘अनोखा भारत’ के अध्याय 2—‘भारत: सोने की चिड़िया (पूँजीपतियों, अवसरवादी देशी कम्पनियों तथा विदेशी कम्पनियों का कब्ज़ा)’ में लिखते हैं:
“ईस्ट इंडिया कंपनी सात समंदर पार से व्यापार करने आई थी और देश को गुलाम बना लिया था। आज हमारी अपनी ही चुनी हुई सरकारों ने देश के जल, जंगल, ज़मीन, खदानें और बंदरगाह मुट्ठी भर देसी-विदेशी कॉर्पोरेट घरानों को तश्तरी में सजाकर सौंप दिए हैं। आज़ादी के समय देश के कुछ परिवारों के पास जो संपत्ति थी, आज वह संपत्ति बढ़कर खरबों में पहुंच चुकी है, जबकि देश का 80 करोड़ नागरिक पांच किलो मुफ्त अनाज के थैले पर जिंदा रहने के लिए मजबूर कर दिया गया है! क्या इसी दिन के लिए हमारे स्वतंत्रता सेनानियों ने फांसी के फंदे चूमे थे? जब मुट्ठी भर लोग पूरे देश के संसाधनों के मालिक बन जाएं, तो वह लोकतंत्र नहीं, बल्कि कॉर्पोरेट तानाशाही (Oligarchy) कहलाता है!”
— एन. सिंह (अनोखा भारत, पृष्ठ 75-76)
लेखक आगे शासन की सांठगांठ पर चोट करते हैं:
“राजनीतिक दल चुनाव लड़ने के लिए इन्हीं पूंजीपतियों से हजारों करोड़ का गुप्त चुनावी चंदा लेते हैं। जब सरकार बनती है, तो वह जनता की नहीं, उन चंदा देने वाले सेठों की बंधक होती है। बजट में फैसले जनता के भले के लिए नहीं, सेठों के शेयर बाजार के भाव बढ़ाने के लिए लिए जाते हैं।”
— (अनोखा भारत, पृष्ठ 79)
राष्ट्रीय संपदा की लूट रोकने के चार बुनियादी उपाय
- प्राकृतिक संसाधनों का राष्ट्रीय ट्रस्ट (National Resource Trust): खदानों, तेल, गैस और बंदरगाहों का निजी एकाधिकार समाप्त किया जाए; इनसे होने वाले कुल मुनाफे का 50% सीधे देश के स्वास्थ्य और शिक्षा बजट में अनिवार्य रूप से डाला जाए।
- कॉर्पोरेट लोन डिफॉल्टर्स की संपत्तियों की त्वरित ज़ब्ती: जो उद्योगपति जानबूझकर बैंक लोन नहीं चुकाते (Wilful Defaulters), उनकी निजी संपत्तियां, बंगले और शेयर तुरंत जब्त किए जाएं और उनके विदेश भागने पर पूर्ण कानूनी रोक हो।
- चुनावी फंडिंग में पूर्ण पारदर्शिता: राजनीतिक दलों को मिलने वाले हर एक रुपये के कॉर्पोरेट चंदे का स्रोत और दाता का नाम सार्वजनिक रूप से चुनाव आयोग की वेबसाइट पर प्रकाशित हो।
- सख्त एंटी-मोनोपोली कानून (Anti-Trust Laws): किसी भी एक कॉर्पोरेट समूह को किसी एक सेक्टर (जैसे हवाई अड्डे, बंदरगाह, दूरसंचार या मीडिया) में 20% से अधिक हिस्सेदारी रखने की अनुमति न हो ताकि स्वस्थ प्रतिस्पर्धा बनी रहे।
एक विचारणीय सवाल (पुस्तक का संदेश)
क्या भारत वास्तव में 140 करोड़ भारतीयों का स्वाभिमानी राष्ट्र है, या यह केवल चंद खरबपतियों की निजी जागीर बनकर रह गया है?
भारत के आर्थिक संसाधनों की इस नई और खतरनाक लूट की पूरी अंतर्कथा को समझने के लिए एन. सिंह की चर्चित पुस्तक ‘अनोखा भारत’ का यह दूसरा अध्याय हर जागरूक नागरिक को ज़रूर पढ़ना चाहिए।
ईस्ट इंडिया कंपनी सात समंदर पार से व्यापार करने आई थी और देश को गुलाम बना लिया था। आज हमारी अपनी ही चुनी हुई सरकारों ने देश के जल, जंगल, ज़मीन, खदानें और बंदरगाह मुट्ठी भर देसी-विदेशी कॉर्पोरेट घरानों को तश्तरी में सजाकर सौंप दिए हैं।