35 हज़ार का जवान और 7-स्टार कल्चर — असली देशभक्त कौन?
एन. सिंह · ·6 मिनट
सियाचिन ग्लेशियर या लद्दाख की बर्फीली चोटियों पर तापमान रात में माइनस चालीस से माइनस पचास डिग्री सेल्सियस तक गिर जाता है।
वहाँ इतनी भयानक ठंड होती है कि यदि आप गलती से भी अपनी नंगी उंगली से अपनी राइफल के बैरल को छू लें, तो आपकी उंगली की खाल धातु से चिपक कर उखड़ जाएगी (Metal Frostbite)। वहाँ हवा में ऑक्सीजन की इतनी कमी होती है कि सामान्य इंसान को दो कदम चलने पर खून की उल्टियां होने लगें।
उस भयानक और दुर्गम वातावरण में रात भर मुस्तैद खड़े उस 20-22 साल के नौजवान का चेहरा देखिए। वह किसी अरबपति का बेटा नहीं है; वह पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान, हरियाणा या उत्तराखंड के किसी गरीब किसान का बेटा है। उसे हर महीने वेतन के नाम पर मात्र 35 से 40 हजार रुपये मिलते हैं। वह जानता है कि यदि सामने से दुश्मन की कोई गोली आई, तो वह हंसते-हंसते अपनी छाती अड़ा देगा ताकि देश के 140 करोड़ नागरिक अपने घरों में चैन की नींद सो सकें।
अब इसके विपरीत, दिल्ली, मुंबई और बेंगलुरु के सेवन-स्टार होटलों, पब्स और क्लबों का नज़ारा देखिए।
वहाँ करोड़ों की गाड़ियों में चलने वाले लोग, जो अपने टैक्स बचाने के लिए सीए की फौज रखते हैं, जो विदेशी शराब के एक-एक घूंट पर उस जवान के पूरे महीने के वेतन से अधिक उड़ा देते हैं, वे रात को शराब के नशे में चिल्लाते हैं—“दिस कंट्री इज़ गोइंग टू द डॉग्स!” और खुद को देश का ‘अभिजात वर्ग’ और भाग्यविधाता घोषित करते हैं!
एन. सिंह अपनी कालजयी पुस्तक ‘अनोखा भारत’ में पूछते हैं: इस देश का असली मालिक और सच्चा देशभक्त कौन है—वह 35 हज़ार रुपये पाने वाला बहादुर जवान, या सेवन-स्टार होटलों में बैठकर देश को लूटने वाला परजीवी वर्ग?
सेना की पेंशन पर कैंची बनाम नेताओं की आजीवन मलाई
आज देश में राष्ट्रवाद की चर्चाएं बहुत तेज़ हैं, परंतु नीतिगत स्तर पर जो निर्णय लिए गए हैं, वे दिल को दहला देने वाले हैं:
- अग्निवीर योजना (Agnipath Scheme): सेना के बजट पर ‘पेंशन का बोझ’ कम करने के नाम पर चार साल की संविदा भर्ती लागू कर दी गई। 75% युवा 24 वर्ष की उम्र में बिना किसी पेंशन, बिना पूर्व-सैनिक दर्जे और बिना किसी सामाजिक सुरक्षा के सेना से बाहर कर दिए जाएंगे!
- नेताओं की कई-कई पेंशनें: दूसरी तरफ, एक विधायक या सांसद यदि केवल एक दिन के लिए भी सदन का सदस्य बन जाए, तो उसे जीवन भर लाखों की पेंशन, मुफ्त हवाई सफर, मुफ्त रेल यात्रा, आलीशान बंगले और मुफ्त चिकित्सा की आजीवन सुविधा मिलती है! यदि वह तीन बार चुना गया, तो तीन अलग-अलग पेंशनें उठाता है! क्या देश के बजट पर इन परजीवियों का कोई ‘बोझ’ नहीं है?
- शहीद के परिवार का संघर्ष: जब कोई जवान तिरंगे में लिपटकर गाँव आता है, तो नेताजी कैमरे के सामने फोटो खिंचवाकर पचास लाख और नौकरी का चेक देने का नाटक करते हैं। लेकिन छह महीने बाद उसी शहीद की वीरांगना पत्नी को पेट्रोल पंप के आवंटन या नौकरी के लिए सरकारी दफ्तरों में बाबुओं की गंदी नजरों और घूसखोरी का सामना करना पड़ता है।
सरहद का जवान बनाम सेवन-स्टार कल्चर: एक कड़वी तुलना
| पैमाना | 35 हज़ार का भारतीय जवान | सेवन-स्टार कल्चर का परजीवी वर्ग |
|---|---|---|
| कार्य की परिस्थितियां | माइनस 40 डिग्री बर्फ, थरथराती आंधियां और गोलियों की बौछार | 24 घंटे वातानुकूलित कमरे, चमचमाती गाड़ियां और लग्जरी पार्टियां |
| पारिवारिक पृष्ठभूमि | भूमिहीन मजदूर, छोटा सीमांत किसान या दिहाड़ी कामगार | बड़े उद्योगपति, भ्रष्ट नौकरशाह, राजनेता और दलाल |
| राष्ट्र के प्रति योगदान | अपना सर्वोच्च यौवन और आवश्यकता पड़ने पर प्राणों का बलिदान | देश के संसाधनों की लूट, टैक्स चोरी और विदेशों में संपत्तियां |
| व्यवस्था का व्यवहार | पेंशन बंद, चार साल की संविदा नौकरी और कड़े नियम | अरबों के बैंक लोन राइट-ऑफ और वीआईपी सुरक्षा प्रोटोकॉल |
किताब से कड़वा सच: एन. सिंह की मार्मिक हुंकार
लेखक एन. सिंह अपनी पुस्तक ‘अनोखा भारत’ (जो उन्होंने भारतीय सेना और भारतीय किसान को समर्पित की है) में लिखते हैं:
“असली देशभक्ति भाषणों में नहीं, बर्फ की बर्फीली हवाओं में और खेत की कीचड़ में जन्म लेती है। जब 35 हजार का जवान तिरंगे में लिपटकर आता है, तो पूरा देश रोता है; लेकिन जो अरबपति देश का पैसा खाकर भाग जाते हैं, व्यवस्था उनके आगे सिर झुकाती है। हमने राष्ट्रवाद को टीवी स्टूडियो के एंकरों की चीख-पुकार बना दिया है, जबकि राष्ट्रवाद की असली इबारत उस जवान की विधवा की आंखों के आंसुओं में लिखी होती है जो अपनी गोद में छह महीने के अनाथ बच्चे को लेकर अपने पति की चिता को मुखाग्नि देती है। जिस देश में सैनिक का सम्मान केवल युद्ध के समय नारे लगाने तक सीमित हो जाए और शांति काल में उसकी पेंशन पर कैंची चलाई जाए, वह देश कभी विश्वगुरु नहीं बन सकता!”
— एन. सिंह (अनोखा भारत, पृष्ठ 164-165)
लेखक आगे चुनौती देते हैं:
“अगर सरकार को पेंशन का खर्च बचाना ही है, तो शुरुआत संसद और विधानसभाओं से करे! नेताओं की सारी पेंशनें बंद की जाएं, और उनके वेतन को सेना के हवलदार के वेतन के बराबर तय किया जाए; फिर देखते हैं कि कितने नेता देश सेवा के लिए राजनीति में आते हैं!”
— (अनोखा भारत, पृष्ठ 168)
जवानों के सम्मान और सुरक्षा के चार राष्ट्रीय संकल्प
- ‘वन रैंक, वन पेंशन’ (OROP) की त्रुटिहीन पूर्ण बहाली: सेना के जवानों और जेसीओ के लिए बिना किसी कानूनी अड़ंगे के वास्तविक ओआरओपी की पूर्ण गारंटी दी जाए।
- अग्निवीर योजना की समीक्षा व नियमितीकरण: चार साल के संविदा मॉडल के बजाय कम से कम 50% से 75% अग्निवीरों को नियमित सेवा में समायोजित किया जाए और शहीद होने पर पूर्ण सैन्य पेंशन व दर्जा मिले।
- नेताओं की पेंशन पर तत्काल पूर्ण रोक: सांसदों और विधायकों की बहु-पेंशन प्रणाली को पूरी तरह समाप्त किया जाए; केवल एक कार्यकाल की भी कोई पेंशन न मिले।
- सैनिक परिवारों की कानूनी और सामाजिक सुरक्षा: शहीद या घायल सैनिकों के बच्चों की पहली कक्षा से लेकर उच्च शिक्षा तक का पूरा खर्च केंद्र सरकार सीधे वहन करे और उनके परिवारों के लिए विशेष फास्ट-ट्रैक अदालतें बनें।
एक विचारणीय सवाल (पुस्तक का संदेश)
क्या हम एक ऐसा कृतघ्न राष्ट्र बने रहना चाहते हैं जो सरहद पर जान देने वाले जवान के कफन पर भी बजट बचाने की दलीलें देता है, जबकि अपने भ्रष्ट नेताओं की अय्याशी पर अरबों लुटाता है?
सैनिक के त्याग, भारतीय रक्षा प्रणाली की वास्तविक चुनौतियों और सच्चे राष्ट्रवाद के मर्म को समझने के लिए एन. सिंह की कालजयी पुस्तक ‘अनोखा भारत’ का यह अध्याय हर देशभक्त भारतीय को पढ़ना चाहिए।
असली देशभक्ति भाषणों में नहीं, बर्फ की बर्फीली हवाओं में और खेत की कीचड़ में जन्म लेती है। जब 35 हजार का जवान तिरंगे में लिपटकर आता है, तो पूरा देश रोता है; लेकिन जो अरबपति देश का पैसा खाकर भाग जाते हैं, व्यवस्था उनके आगे सिर झुकाती है।