'प्रधान-पति' से 'सांसद-पति' — क्या 33% महिला आरक्षण से औरत सचमुच आज़ाद होगी?
एन. सिंह · ·6 मिनट
यदि आपने कभी किसी भारतीय गाँव की ग्राम पंचायत की बैठक देखी हो, तो एक अत्यंत हास्यास्पद परंतु शर्मनाक दृश्य ज़रूर देखा होगा।
पंचायत भवन की मुख्य कुर्सी पर एक मूछों वाले दबंग सज्जन बैठे होते हैं। नेमप्लेट पर लिखा होता है—“श्रीमती विमला देवी, ग्राम प्रधान”। लेकिन कुर्सी पर बैठे सज्जन पूरे रौब से कहते हैं—“हम प्रधान-पति हैं! विमला देवी घर पर रोटी बना रही हैं, पंचायत के सारे काम, दस्तखत और फैसले हम ही करते हैं।” ब्लॉक की बैठकों से लेकर थाने-तहसील तक, अधिकारियों के साथ चाय पीने और कमीशन तय करने का काम केवल यह ‘प्रधान-पति’ या ‘मुखिया-पति’ ही करता है।
यह कोई अपवाद नहीं है; देश की लाखों पंचायतों में चुनी गई 80% से अधिक महिला प्रतिनिधि केवल एक ‘रबर स्टाम्प’ (Rubber Stamp) या डमी मुखौटा मात्र हैं।
अब संसद ने ऐतिहासिक नारी शक्ति वंदन अधिनियम (106वां संविधान संशोधन) पारित करके लोकसभा और राज्यों की विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण का मार्ग प्रशस्त किया है। इस कानून का पूरे देश ने स्वागत किया।
लेकिन हमें यह निर्मम सवाल पूछना ही होगा: क्या पंचायतों का ‘प्रधान-पति सिंड्रोम’ अब संसद और विधानसभाओं में पहुंचकर ‘सांसद-पति’ और ‘विधायक-पति’ के नए अभिजात रूप में नहीं बदल जाएगा? क्या इस कानून से खेत-खलिहान में पसीना बहाने वाली आम महिला सशक्त होगी, या केवल राजनीतिक बाहुबलियों और वंशवादी नेताओं की पत्नियों, बेटियों और बहुओं के लिए सीटें सुरक्षित हो जाएंगी?
राजनीतिक वंशवाद का नया सुरक्षा-कवच: डमी महिला राजनीति
भारतीय राजनीति में जब भी किसी पुरुष बाहुबली या नेता की सीट महिला के लिए आरक्षित होती है, तो वह नेता किसी पार्टी कार्यकर्ता महिला को टिकट नहीं देता; वह तुरंत अपनी अनपढ़ पत्नी, भाभी या बेटी को चुनावी मैदान में उतार देता है।
- लालू-राबड़ी मॉडल का राष्ट्रीयकरण: 1997 में जब चारा घोटाले में लालू प्रसाद यादव को जेल जाना पड़ा, तो उन्होंने बिहार की कमान अपनी घरेलू पत्नी राबड़ी देवी को सौंप दी। सरकार पर्दे के पीछे से वही चलाते रहे। यह मॉडल आज कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक हर दल का पसंदीदा हथियार बन चुका है।
- संसद में मूक उपस्थिति: विधानसभाओं और संसद में आज भी जो महिला सांसद केवल परिवार के नाम पर चुनकर आती हैं, वे महत्वपूर्ण रक्षा, वित्त या गृह नीति की बहसों में कभी हिस्सा नहीं लेतीं। उनके सारे भाषण और संसदीय प्रश्न उनके पति, पिता या राजनीतिक आकाओं द्वारा लिखे जाते हैं।
- आम कार्यकर्ता महिला का निष्कासन: जो महिला कार्यकर्ता वर्षों तक धूप-धूल में झंडे उठाती है, जनता के बीच धरने देती है, उसे टिकट कभी नहीं मिलता; क्योंकि टिकट वितरण के समय नेताजी की तिजोरी और बाहुबली परिवार की महिला ही बाजी मार ले जाती है।
वास्तविक महिला सशक्तिकरण बनाम ‘डमी’ महिला आरक्षण
| आयाम | सांकेतिक ‘डमी’ आरक्षण (वर्तमान खतरा) | वास्तविक महिला सशक्तिकरण (सच्चा लक्ष्य) |
|---|---|---|
| उम्मीदवार का चयन | बाहुबली, करोड़पति और वंशवादी नेताओं के परिवारों की महिलाएं | ज़मीन पर संघर्ष करने वाली, सामाजिक कार्यकर्ता और शिक्षित महिलाएं |
| निर्णय लेने की स्वतंत्रता | पति, ससुर या भाई के इशारे पर दस्तखत करने वाली कठपुतली | सदन और मंत्रालयों में स्वतंत्र रूप से नीतियां बनाने का साहस |
| प्राथमिकता के मुद्दे | केवल पार्टी आलाकमान की चापलूसी और परिवार का वर्चस्व | महिला स्वास्थ्य, सुरक्षा, मातृत्व अवकाश, समान वेतन और शिक्षा |
| समाजिक प्रभाव | सामंती पुरुष सत्ता की अप्रत्यक्ष जीत | पितृसत्ता की बेड़ियों का टूटना और महिलाओं में वास्तविक नेतृत्व |
किताब से कड़वा सच: एन. सिंह की दो टूक समीक्षा
लेखक एन. सिंह अपनी पुस्तक ‘गिनती से सत्ता तक’ के अध्याय ‘महिला आरक्षण और पितृसत्ता का मुखौटा’ में लिखते हैं:
“जब तक महिला को केवल अपने परिवार के पुरुष की राजनीतिक जागीर सुरक्षित रखने की डमी उम्मीदवार बनाया जाएगा, तब तक संसद में 33% क्या 50% आरक्षण भी आ जाए, फैसले पुरुषवादी अहंकार ही लेगा। कानून संसद में पास हो सकता है, लेकिन अगर घर की रसोई और परिवार के भीतर महिला को अपनी बात कहने की आजादी नहीं है, तो संसद की कुर्सी पर बैठकर भी वह केवल अपने पति के आदेशों का पालन करेगी। महिला आरक्षण लोकतंत्र का आभूषण नहीं होना चाहिए; उसे पितृसत्ता की छाती पर पड़ने वाला हथौड़ा होना चाहिए था। परंतु नेताओं ने इसे अपनी पारिवारिक जागीरों को बचाने की ढाल बना लिया है।”
— एन. सिंह (गिनती से सत्ता तक, पृष्ठ 144-145)
लेखक आगे एक बहुत तीखा सवाल उठाते हैं:
“क्या किसी राजनीतिक दल में यह नैतिक साहस है कि वह घोषणा करे कि वह किसी भी मौजूदा सांसद या विधायक की पत्नी, बेटी या बहू को महिला कोटे से टिकट नहीं देगा? जब तक यह साहस नहीं होगा, तब तक 33% आरक्षण केवल पारिवारिक घरानों की निजी सीटों का विस्तार बनकर रह जाएगा।”
— (गिनती से सत्ता तक, पृष्ठ 148)
‘सांसद-पति’ सिंड्रोम को रोकने के चार कानूनी उपाय
- सख्त आचरण नियमावली और निलंबन: यदि किसी महिला जनप्रतिनिधि की आधिकारिक बैठक या दफ्तर में उसका पति, भाई या पिता सरकारी फाइलों में हस्तक्षेप करता पाया जाए, तो महिला प्रतिनिधि की सदस्यता तुरंत रद्द की जाए और उस पुरुष पर सरकारी काम में बाधा डालने का मुकदमा चले।
- परिवारवाद पर कड़ा अंकुश: राजनीतिक दलों के लिए यह कानूनी बाध्यता हो कि महिला कोटे की 33% सीटों में से कम से कम 70% सीटें उन महिलाओं को दी जाएं जिनका कोई पूर्व पारिवारिक राजनीतिक इतिहास न हो।
- नेतृत्व और संसदीय प्रशिक्षण: निर्वाचित महिला सांसदों और विधायकों के लिए न्यूनतम तीन महीने का सघन नीतिगत, बजटीय और कानूनी प्रशिक्षण अनिवार्य किया जाए ताकि वे नौकरशाहों के रहमोकरम पर न रहें।
- महिला उम्मीदवारों के लिए विशेष चुनावी फंड: कॉर्पोरेट और बाहुबल के पैसे के मुकाबले ज़मीनी संघर्षशील महिलाओं को चुनाव लड़ने के लिए राज्य द्वारा चुनावी खर्च (State Funding of Elections) मुहैया कराया जाए।
एक विचारणीय सवाल (पुस्तक का संदेश)
क्या भारतीय महिला केवल मतदान करने और घूंघट की ओट में दस्तखत करने के लिए बनी है, या वह इस देश के भविष्य का फैसला अपनी स्वतंत्र बुद्धि से करने का साहस रखती है?
महिला आरक्षण के इस अनकहे सच, राजनीतिक चालबाजियों और वास्तविक मुक्ति के मार्ग को गहराई से समझने के लिए एन. सिंह की चर्चित पुस्तक ‘गिनती से सत्ता तक: भारत का अनकहा युद्ध’ का यह अध्याय हर जागरूक नागरिक और महिला को पढ़ना चाहिए।
जब तक महिला को केवल अपने परिवार के पुरुष की राजनीतिक जागीर सुरक्षित रखने की डमी उम्मीदवार बनाया जाएगा, तब तक संसद में 33% क्या 50% आरक्षण भी आ जाए, फैसले पुरुषवादी अहंकार ही लेगा।