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घाटे का सौदा बनती खेती — खाली होते गाँव और शहरों की झुग्गियों में भटकता युवा

एन. सिंह · ·3 मिनट

गाँव के किसी बुजुर्ग चौपाल पर बैठिए और उनसे एक सीधा सवाल पूछिए: “बाबा, क्या आप चाहते हैं कि आपका बेटा या पोता भी खेती करे?”

दस में से नौ बुजुर्ग गहरी सांस खींचकर कहेंगे: “नहीं बेटा! हमने जो भुगता सो भुगता, हम नहीं चाहते कि हमारी अगली पीढ़ी भी इस कीचड़ और कर्ज़ में अपनी ज़िंदगी बर्बाद करे। इसे शहर भेज देंगे, चाहे किसी दुकान पर चपरासी बन जाए, पर खेती न करे!”

यह वाक्य केवल एक बुजुर्ग का दर्द नहीं है; यह भारत के ग्रामीण समाज का मृत्यु-पत्र (Death Certificate) है!

जिस देश की पहचान ‘कृषि-प्रधान’ देश की रही हो, जहाँ ‘उत्तम खेती, मध्यम बान, निकृष्ट चाकरी, भीख निदान’ की कहावत सदियों से गूँजती रही हो, आज उसी देश में खेती सबसे निकृष्ट और अपमानजनक पेशा बना दी गई है।


पलायन: विकास का सपना या मजबूरी का दंश?

अपनी पुस्तक ‘उजड़ती खेती, उजड़ते गाँव’ के सातवें अध्याय में लेखक एन. सिंह और विमला सिंह इस ग्रामीण विस्थापन का दिल दहला देने वाला समाजशास्त्रीय विश्लेषण करते हैं।

आज बिहार, पूर्वांचल, बुंदेलखंड, ओडिशा और राजस्थान के गाँवों से नौजवानों का जो रेला मुंबई, दिल्ली, सूरत और लुधियाना की ओर दौड़ रहा है, वह किसी बड़े सपने के पीछे नहीं भाग रहा। वह गाँव की भुखमरी और खेती के असहनीय घाटे से जान बचाकर भाग रहा है।

डीज़ल के दाम आसमान छू रहे हैं, खाद की कालाबाज़ारी है, कीटनाशक नकली मिल रहे हैं, बिजली समय पर नहीं आती, और जब फसल तैयार होती है तो आवारा पशु या बेमौसम ओलावृष्टि उसे लील जाती है। बची-खुची फसल को जब किसान मंडी ले जाता है, तो आढ़तिया कौड़ियों के भाव खरीदता है।

इस निरंतर घाटे ने किसान को इस कदर तोड़ दिया है कि वह अपने पुश्तैनी घर पर ताला लगाकर 10 बाई 10 की अंधेरी झुग्गी में 12-12 घंटे पसीना बहाने को तैयार है।


किताब से कड़वा सच

“गाँव अब केवल श्मशान और बुजुर्गों का आश्रम बनते जा रहे हैं। जब गाँव से युवा शक्ति निकल जाती है, तो पीछे केवल लाचारी और बीमारी बचती है। शहरों के नीति-निर्माता इसे ‘शहरीकरण’ (Urbanization) और आर्थिक विकास का सूचक बताते हैं। लेकिन यह शहरीकरण नहीं, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था का जबरन गला घोंटकर महानगरों के लिए सस्ता, बेसहारा मजदूर तैयार करने का पूंजीवादी षड्यंत्र है।”
— ‘उजड़ती खेती, उजड़ते गाँव’ (अध्याय 7)


असली समाधान क्या है?

  1. खेती को सम्मानजनक और लाभप्रद पेशा बनाना: कृषि उत्पादों के दाम महंगाई सूचकांक (Consumer Price Index) से जोड़े जाएं, ताकि किसान की क्रय-शक्ति उद्योगपतियों और सरकारी कर्मचारियों के बराबर बनी रहे।
  2. ग्रामीण औद्योगिकीकरण: गाँव के भीतर ही कृषि आधारित कुटीर उद्योग, जैविक खाद इकाइयां और सौर ऊर्जा पार्क लगाए जाएं, ताकि ग्रामीण युवाओं को अपने घर के 5 किलोमीटर के दायरे में सम्मानजनक रोज़गार मिले।
  3. आवारा पशु समस्या का स्थायी समाधान: केवल कागज़ी गोशालाओं के बजाय ग्राम पंचायत स्तर पर गौ-अभयारण्य और गोबर-गौमूत्र की अनिवार्य सरकारी खरीद नीति लागू हो।

एक विचारणीय सवाल (पुस्तक का संदेश)

यदि गाँव खाली हो गए और खेती पूरी तरह कॉरपोरेट कंपनियों के हाथ में चली गई, तो क्या इस देश का लोकतंत्र और भोजन सुरक्षित रहेगा? पुस्तक ‘उजड़ती खेती, उजड़ते गाँव’ का यह अध्याय हर संवेदनशील नागरिक को सोचने पर विवश करता है।

गाँव का खाली होना केवल जनसांख्यिकी का बदलना नहीं है; यह उस संस्कृति, सामूहिक अपनत्व और स्वावलंबन का विनाश है जिसने भारत को हज़ारों वर्षों तक अकाल और आपदाओं में भी जीवित रखा।

आज़ाद कलम — एन. सिंह

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